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साइंस सेंटर में 160 बच्चों ने टेलीस्कोप से देखा सुपरमून का जादुई नजारा

आंचलिक विज्ञान केंद्र में सुपरमून अवलोकन कार्यक्रम में स्कूली बच्चों ने किया खगोलीय घटना का अद्भुत अनुभव

भोपाल। आंचलिक विज्ञान केंद्र में आयोजित सुपरमून अवलोकन कार्यक्रम ने विज्ञान और खगोल विज्ञान के प्रति बच्चों में अद्वितीय रुचि और जिज्ञासा पैदा की। इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन उस खगोलीय घटना को देखने के लिए किया गया, जिसे सुपरमून के नाम से जाना जाता है। इस घटना में चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होने के कारण सामान्य से 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत अधिक चमकीला दिखाई देता है।

सुपरमून तब होता है जब चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है और इस बार यह 357,175 किलोमीटर की दूरी पर था। इस स्थिति में चंद्रमा का आकार और चमक सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक होती है, जिससे यह एक अनोखा खगोलीय दृश्य बन जाता है। जब चंद्रमा पृथ्वी से दूर अपनी कक्षा में होता है, तब इसे माइक्रोमून कहा जाता है और इस दौरान इसकी दूरी लगभग 4 लाख 5 हजार किलोमीटर होती है। सुपरमून और माइक्रोमून की तुलना में यह खगोलीय घटना और भी रोमांचक हो जाती है, क्योंकि यह चंद्रमा का विशाल और चमकदार रूप प्रस्तुत करती है।


सुपरमून अवलोकन में स्कूली बच्चों की भागीदारी

इस खगोलीय घटना का अनुभव करने के लिए आंचलिक विज्ञान केंद्र में 160 से अधिक लोगों ने भाग लिया, जिनमें अधिकतर स्कूली बच्चे शामिल थे। बच्चों के लिए यह एक अद्भुत अवसर था, क्योंकि उन्होंने एडवांस्ड कंप्यूटराइज्ड टेलीस्कोप का उपयोग करके चंद्रमा की सतह का विस्तृत अवलोकन किया। टेलीस्कोप के माध्यम से बच्चों ने चंद्रमा पर मौजूद गड्ढों, पहाड़ों और अन्य भूगोलिक विशेषताओं को करीब से देखा। यह न केवल बच्चों के लिए एक मनोरंजक अनुभव था, बल्कि उन्हें चंद्रमा के बारे में कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी भी मिली।

कार्यक्रम में उपस्थित विज्ञान केंद्र के क्यूरेटर साकेत सिंह कौरव ने बच्चों के सवालों का उत्तर दिया, जिनमें से एक महत्वपूर्ण प्रश्न था कि क्या पृथ्वी के अलावा ब्रह्मांड में कहीं और जीवन संभव है। इसके अलावा बच्चों ने जुपिटर ग्रह पर गोल चक्र के बारे में भी जानकारी प्राप्त की। इन सवालों के उत्तर देने के दौरान वैज्ञानिकों ने बच्चों को ब्रह्मांड और खगोल विज्ञान से जुड़े कई रोचक तथ्य बताए।


खगोल विज्ञान में वैज्ञानिक जिज्ञासा का विकास

आंचलिक विज्ञान केंद्र के परियोजना समन्वयक साकेत सिंह कौरव ने कहा हम विद्यार्थियों को विज्ञान और खगोल विज्ञान के प्रति जागरूक और उत्साहित करने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। सुपरमून जैसी खगोलीय घटनाएं बच्चों के मन में वैज्ञानिक जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं और उन्हें विज्ञान के क्षेत्र में रुचि लेने के लिए प्रेरित करती हैं।

सुपरमून का अवलोकन बच्चों के लिए एक शानदार अनुभव था, जिसमें उन्होंने न केवल चंद्रमा को बड़े और चमकदार रूप में देखा, बल्कि उन्होंने यह भी सीखा कि चंद्रमा की सतह पर गड्ढे और पहाड़ कैसे बने हैं और इसका वैज्ञानिक महत्त्व क्या है। यह अवलोकन कार्यक्रम बच्चों के लिए विज्ञान के प्रति नई दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक सिद्ध हुआ।


टेलीस्कोप और विज्ञान केंद्र की विशेष व्यवस्थाएं

इस कार्यक्रम के दौरान विज्ञान केंद्र ने एडवांस्ड कंप्यूटराइज्ड टेलीस्कोप की व्यवस्था की थी, जिससे बच्चों और अन्य दर्शकों को चंद्रमा के विस्तृत अध्ययन का अवसर मिला। इन टेलीस्कोपों के माध्यम से चंद्रमा की सतह पर मौजूद विभिन्न भूगोलिक विशेषताओं को देखने का मौका मिला। बच्चों ने टेलीस्कोप का उपयोग कर पहली बार इतने नजदीक से चंद्रमा को देखा, जिससे उनकी खगोल विज्ञान के प्रति रुचि और बढ़ी।

सुपरमून के अवलोकन के दौरान, विज्ञान केंद्र की टीम ने बच्चों को चंद्रमा के बारे में कई रोचक तथ्य बताए। बच्चों को बताया गया कि चंद्रमा की सतह पर गड्ढे कैसे बने और चंद्रमा पर कोई जीवन क्यों संभव नहीं है। इस दौरान बच्चों ने वैज्ञानिकों के साथ बातचीत की और अपने सवालों के जवाब पाए। बच्चों ने सुपरमून की अद्भुत चमक और आकार के बारे में जाना और यह भी समझा कि चंद्रमा के प्रकाश का स्रोत सूर्य का परावर्तन होता है।


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