भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित दो दिवसीय पूर्व लोकमानथन कार्यक्रम का समापन समारोह आवृति भवन में रविवार को भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। इस आयोजन का उद्देश्य जनजातीय समुदायों द्वारा सदियों से संरक्षित पारंपरिक औषधियों और उनके स्वास्थ्य लाभों पर प्रकाश डालना था। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा एवं आयुष मंत्री इंदर सिंह परमार उपस्थित रहे, जिन्होंने अपने सारगर्भित भाषण से जनजातीय चिकित्सा पद्धतियों की महत्ता और उनकी वर्तमान चुनौतियों पर गहराई से चर्चा की।
समारोह को संबोधित करते हुए श्री परमार ने कहा कि आज के आधुनिक दौर में परंपरागत औषधियों को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जनजातीय वैद्य, जो सदियों से अपने पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक औषधियों का उपयोग करते आ रहे हैं, उन्हें आज भी मुख्यधारा की चिकित्सा प्रणाली द्वारा पूरी मान्यता नहीं मिलती है। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि कैसे ग्रामीण इलाकों में लोग बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी पेड़-पौधों के औषधीय गुणों से परिचित हैं, लेकिन फिर भी यह ज्ञान व्यापक चिकित्सा समुदाय द्वारा नहीं स्वीकारा जाता है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यह परंपरागत ज्ञान जो पीढ़ियों से चला आ रहा है, उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मान्यता देने की आवश्यकता है। हमारे पूर्वजों ने अपने समय में औषधीय पौधों पर शोध किया और यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। आज हमें इसे विलुप्त होने से बचाने और इसे मान्यता देने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रफुल्ल केलकर ने स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत में अभी भी स्वास्थ्य सेवाओं तक सहज पहुंच का अभाव है, विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को नकार कर सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जो कि सभी के लिए किफायती नहीं हैं। हमें स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती, सुलभ और समग्र (हॉलिस्टिक) बनाने की आवश्यकता है।
श्री केलकर ने कहा कि भारत सरकार द्वारा आयुष्मान भारत और वन हेल्थ मिशन जैसी योजनाएं प्रारंभ की गई हैं, जो स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। लेकिन इसके साथ ही जनजातीय समुदायों की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को भी मुख्यधारा में लाने की जरूरत है, जिससे देश की बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल सके।
कार्यक्रम में संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे ने भी जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और औषधियों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय जंगल को ही अपना जीवन मानते हैं और उनके लिए जंगल की वनस्पतियां औषधियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विकासशील देशों में, जहां एक तिहाई जनसंख्या आवश्यक औषधियों तक पहुंच नहीं रखती, वहां पारंपरिक औषधियां स्वास्थ्य देखभाल के लिए एक प्रभावशाली और सुरक्षित विकल्प प्रदान कर सकती हैं।
प्रो. पांडे ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां न केवल जनजातीय समुदायों के लिए बल्कि व्यापक समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संसाधन साबित हो सकती हैं, यदि इन्हें सही तरीके से संरक्षित और प्रचारित किया जाए।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मंत्री इंदर सिंह परमार का स्वागत संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे द्वारा किया गया। उन्हें शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह और बुके भेंट कर सम्मानित किया गया। इस आयोजन में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों ने जनजातीय ज्ञान और औषधियों की सराहना की और इसे संरक्षित करने के प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम के दौरान, वक्ताओं ने यह भी बताया कि आज जब दुनिया तेजी से आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों की ओर बढ़ रही है, तब भी जनजातीय समुदायों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पारंपरिक औषधियों की वैज्ञानिक जांच और मान्यता बेहद जरूरी है। श्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि केवल एलोपैथी से किसी देश की स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। हमें जनजातीय वैद्यों और उनकी औषधियों को भी मान्यता देनी होगी, क्योंकि यह ज्ञान पीढ़ियों से चला आ रहा है और इसका प्रमाण भी है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यह जरूरी है कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जाए ताकि जनजातीय चिकित्सा पद्धतियों का वैज्ञानिक आधार स्थापित किया जा सके। इससे न केवल इन पद्धतियों को मान्यता मिलेगी, बल्कि इन्हें नई पीढ़ियों तक पहुंचाने और संरक्षित करने का रास्ता भी खुलेगा।
इस आयोजन के दौरान भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत और वन हेल्थ मिशन की भी सराहना की गई। श्री प्रफुल्ल केलकर ने इन योजनाओं को देश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि ये योजनाएं समग्र स्वास्थ्य देखभाल के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं, लेकिन इसके साथ ही जनजातीय चिकित्सा पद्धतियों को भी मुख्यधारा में लाना जरूरी है।
कार्यक्रम का समापन संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं और सहभागियों का धन्यवाद किया और इस आयोजन की सफलता के लिए सभी को शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. सुदीपा रॉय ने भी इस अवसर पर सभी का आभार व्यक्त किया।
दो दिवसीय पूर्व लोकमानथन का यह आयोजन जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और औषधियों को संरक्षित करने और उन्हें मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कदम था। इस आयोजन ने न केवल जनजातीय चिकित्सा पद्धतियों की महत्ता को रेखांकित किया, बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार और समग्र स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता पर भी ध्यान केंद्रित किया।
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