खजुराहो। मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित 'आदिवर्त' जनजातीय लोककला राज्य संग्रहालय, खजुराहो में हर रविवार आयोजित होने वाले देशज’ समारोह ने 6 अक्टूबर को बुन्देली लोकगीतों, भजनों और जनजातीय नृत्यों के संगम से दर्शकों का मन मोह लिया। इस अवसर पर विभिन्न कलाकारों द्वारा बुन्देली लोक परंपरा और जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर की शानदार प्रस्तुतियां दी गईं।
इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और कलाकारों के स्वागत के साथ हुआ। प्रमुख अतिथियों में शिखर सम्मान प्राप्त वरिष्ठ बैगा जनजातीय कलाकार सावनी बाई बैगा और नायब तहसीलदार राजनगर प्रतीक रजक शामिल रहे। उन्होंने कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए उनका अभिनंदन किया।
कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति सतना की अंशिका राजौतिया और उनके साथियों द्वारा दी गई। उन्होंने बुन्देली लोकगीतों और भजनों से समां बांध दिया। इन गीतों में बुन्देली लोकसंस्कार, देवीगीत और भजनों की गूंज ने श्रोताओं को प्राचीन बुन्देली संस्कृति और उसकी धार्मिक परंपराओं से परिचित कराया। इस प्रस्तुति में अंशिका राजौतिया का साथ अशंक राजौतिया, गोपाल तिवारी, जीतेंद्र नागर, वीरेंद्र सिंह और रुपेश श्रीवास्तव ने बखूबी निभाया। बुन्देली गीतों की मधुर धुनों के साथ इन कलाकारों की संगत ने कार्यक्रम को और भी सजीव बना दिया।
बुन्देली लोकगीत की विशेष प्रस्तुति
इसके बाद छतरपुर से आए अश्वनी कुशवाहा ने बुन्देली लोकगीतों की प्रस्तुति दी। इन गीतों में चेतावनी भजन, बिलवारी, लेद, ढिमरियाई, राई और भगत जैसे पारंपरिक बुन्देली गीतों की बेमिसाल झलक दिखाई दी। अश्वनी कुशवाहा के साथ धीरज अहिरवार, देवांश खरे, पट्टू खरे, कमलाकांत अहिरवार, सचिन परिहार और हल्के कुशवाहा ने संगत करते हुए इन गीतों को विशेष रूप से जीवंत किया। इन लोकगीतों ने श्रोताओं को बुन्देलखंड की ग्रामीण और सांस्कृतिक धरोहर के करीब ला दिया।
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक हिस्सा अशोक कुमार मार्को और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया गुदुमबाजा नृत्य रहा। यह नृत्य गोण्ड जनजाति की उपजाति ढुलिया का पारंपरिक नृत्य है, जो विशेष रूप से विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। नृत्य के दौरान कलाकारों ने गुदुम, ढफ, मंजीरा, शहनाई और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ गोण्ड जनजाति के पारंपरिक गीतों की धुनों पर नृत्य किया।
गुदुमबाजा नृत्य में पारंपरिक वाद्यों की ध्वनि और कलाकारों की तालबद्ध मुद्राओं ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। यह नृत्य न केवल गोण्ड जनजाति की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है, बल्कि इसमें उनकी पारंपरिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों की भी झलक मिलती है। इस नृत्य का प्रदर्शन विवाह और अन्य धार्मिक अवसरों पर किया जाता है, जिससे इस नृत्य का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
देशज समारोह के तहत हर रविवार को विभिन्न जनजातीय और लोककलाओं की प्रस्तुति होती है। आगामी 13 अक्टूबर को भी कई अनूठी प्रस्तुतियां होने वाली हैं। इनमें इंद्रजीत दीक्षित और उनके साथी खजुराहो द्वारा 'जवारे नृत्य' की प्रस्तुति होगी, जो जनजातीय नृत्य की एक अनूठी शैली है। इसके साथ ही बलीराम पटेल और उनके साथी दमोह द्वारा बुन्देली लोकगीत की प्रस्तुति दी जाएगी। सागर की पूजा श्रीवास्तव ‘अखाड़ा नृत्य’ का प्रदर्शन करेंगी, जबकि पन्ना की बेदिका मिश्रा द्वारा बुन्देली लोकगीत और भजन की मनमोहक प्रस्तुति दी जाएगी।
देशज समारोह का उद्देश्य राज्य की जनजातीय और ग्रामीण लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन करना है। यह आयोजन न केवल दर्शकों को पारंपरिक लोककलाओं से परिचित कराता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का भी प्रयास करता है। आदिवर्त संग्रहालय में आयोजित होने वाले इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का मंच मिलता है, जिससे वे अपनी संस्कृति को जीवित रख सकते हैं और उसका प्रचार-प्रसार कर सकते हैं।
संग्रहालय के इस प्रयास ने न केवल लोककलाओं को संजीवनी दी है, बल्कि जनजातीय जीवन और उनके सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को भी व्यापक जनसमुदाय के समक्ष लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। ऐसे समारोहों से जनजातीय कलाकारों और लोक कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे वे अपनी कला को और भी निखार सकते हैं और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकते हैं।
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