भोपाल। मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) में 15 नवंबर को बिरसा मुंडा जयंती के 150 वर्ष पूरे होने पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया। यह आयोजन सालभर चलने वाले उत्सव की शुरुआत का प्रतीक था, जिसका उद्देश्य बिरसा मुंडा के जीवन, संघर्ष और जनजातीय अधिकारों के प्रति उनके योगदान को उजागर करना है।
इस कार्यक्रम का आयोजन अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. शैलेन्द्र जैन के मार्गदर्शन में हुआ। वास्तुकला एवं योजना विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरभि मेहरोत्रा और डॉ. बुलबुल शुक्ला ने इसे समन्वित किया। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों और संकाय सदस्यों को जनजातीय समाज की संस्कृति, जीवनशैली और उनके अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना था।
कार्यक्रम तीन प्रमुख हिस्सों में विभाजित था, जिसमें विशेषज्ञ सत्र, छात्रों की प्रस्तुति और जनजातीय जीवनशैली पर खुली चर्चा शामिल थीं।
कार्यक्रम का प्रथम भाग 'लोकसूत्र' के अंतर्गत विशेषज्ञ सत्र था। इस सत्र का संचालन प्रसिद्ध वास्तुकार अच्युत सिद्धा और अपूर्वा मिश्रा ने किया। दोनों विशेषज्ञ जनजातीय समुदायों, उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक धरोहर के बारे में गहन जानकारी साझा करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
विशेषज्ञों ने जनजातीय समाज की समृद्ध परंपराओं और उनकी चुनौतियों को उजागर किया। गोंड कला रूपों पर विशेष ध्यान देते हुए, उन्होंने "गोंडवर्स" नामक एक पुस्तक प्रस्तुत की। यह पुस्तक गोंड समुदाय की कला और उनकी पारंपरिक जीवनशैली की एक झलक प्रदान करती है। सत्र ने छात्रों और संकाय सदस्यों को जनजातीय समाज के प्रति संवेदनशील बनने और उनकी संस्कृति की रक्षा के लिए काम करने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में, वास्तुकला एवं योजना विभाग के द्वितीय वर्ष के छात्रों ने आदिवासी आवास और उनकी कला पर आधारित अपने प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए। इस प्रस्तुति में छात्रों ने आदिवासी समाज के आवासीय ढांचे और उनकी जीवनशैली की जटिलताओं को समझने और उन्हें रचनात्मक रूप से दर्शाने का प्रयास किया।
प्रस्तुति ने बिरसा मुंडा के योगदान को भी रेखांकित किया, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान आदिवासी समाज की स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। छात्रों ने बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए मुंडा विद्रोह और उनके बलिदान के बारे में सीखा।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में, छात्रों और विशेषज्ञों के बीच जनजातीय समाज और उनकी चुनौतियों पर चर्चा हुई। इस चर्चा ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक धरोहर और उनके अधिकारों की रक्षा के महत्व को उजागर किया।
छात्रों को यह समझने का अवसर मिला कि बिरसा मुंडा ने अपने जीवन में आदिवासी समाज को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से बचाने के लिए किस प्रकार संघर्ष किया। उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के लिए जो प्रयास किए, वे आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
बिरसा मुंडा, जिन्हें 'धरती आबा' (पृथ्वी पिता) के नाम से भी जाना जाता है, आदिवासी समाज के स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने ब्रिटिश शोषण के खिलाफ मुंडा विद्रोह का नेतृत्व किया और आदिवासी समाज की पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। इस कार्यक्रम के माध्यम से उनकी विरासत को सजीव रखने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम ने छात्रों को न केवल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के बारे में जानकारी दी, बल्कि उनके प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ाई। यह आयोजन इस बात का एक मजबूत उदाहरण है कि किस प्रकार शिक्षा संस्थान न केवल अकादमिक ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक भी तैयार कर सकते हैं।
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