भोपाल। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और जैव सूचना केंद्र ने 23 से 26 सितंबर तक "पशु कोशिका संवर्धन तकनीक" पर चार दिवसीय कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया। यह कार्यशाला पीएम उषा (मेरू) योजना के तहत आयोजित की गई, जिसमें भोपाल के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के 50 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को पशु कोशिका संवर्धन, वायरल कल्चर, वैक्सीन निर्माण और स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में कोशिका संवर्धन तकनीकों के महत्व के बारे में व्यावहारिक और सैद्धांतिक ज्ञान प्रदान करना था।
प्रतिष्ठित विशेषज्ञों का मार्गदर्शन
कार्यशाला में विभिन्न प्रसिद्ध संस्थानों से आए विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को संबोधित किया और उन्हें अत्याधुनिक कोशिका संवर्धन तकनीकों के बारे में गहन जानकारी दी। विशेषज्ञों में प्रमुख रूप से प्रो. अश्विन कोटनिस (एम्स), डॉ. अतुल कुमार पटेरिया (वरिष्ठ वैज्ञानिक, एनआईएचएसएडी), प्रो. पुनीत गांधी (बीएमएचआरसी), डॉ. श्याम कुमार नंदी (उप निदेशक, वायरोलॉजी लैब, आईसीएमआर, मुंबई), डॉ. राम कुमार नेमा (वैज्ञानिक बी, एनआईआरईएच) और सेंट जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी के प्रिंसिपल प्रोफेसर आशीष आचार्य शामिल थे।
इन सभी विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को पशु कोशिका संवर्धन की भूमिका, वायरल कल्चर के महत्त्व, वैक्सीन निर्माण की प्रक्रिया और स्वास्थ्य देखभाल में कोशिका संवर्धन तकनीक के उपयोग पर व्याख्यान दिया। उनके सत्रों ने न केवल तकनीकी जानकारी प्रदान की, बल्कि प्रतिभागियों को वैज्ञानिक अनुसंधान के विभिन्न पहलुओं को समझने में भी मदद की।
कोशिका संवर्धन तकनीक के व्यावहारिक सत्र
सैद्धांतिक सत्रों के अलावा कार्यशाला में व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें प्रतिभागियों को पशु कोशिका संवर्धन और प्राथमिक कोशिका संवर्धन से डीएनए अलगाव के विभिन्न बुनियादी तरीकों का प्रशिक्षण दिया गया। प्रतिभागियों को यह सिखाया गया कि कैसे कोशिका संवर्धन तकनीकों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के वायरल और वैक्सीन अनुसंधान में किया जा सकता है। इन सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने प्रयोगशाला उपकरणों का उपयोग कर वास्तविक समय में कोशिकाओं को संवर्धित किया और विभिन्न प्रक्रियाओं को सीखा।
कार्यशाला का समापन समारोह
कार्यशाला के समापन के अवसर पर एक औपचारिक समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. आईके मंसूरी की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रोफेसर नीरज गौर (निदेशक, बीयूआईटी), प्रोफेसर विपिन व्यास (नोडल अधिकारी, पीएम उषा/मेरू) और प्रोफेसर रागिनी गोथलवाल (विभागाध्यक्ष, जैव प्रौद्योगिकी विभाग) ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।
समापन समारोह में सभी गणमान्य व्यक्तियों ने कार्यशाला के महत्व और इसे सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की सराहना की। प्रोफेसर नीरज गौर ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा ऐसी कार्यशालाएं न केवल शोधकर्ताओं और छात्रों को नई तकनीकों से अवगत कराती हैं, बल्कि उन्हें व्यावहारिक अनुभव प्रदान कर उनके भविष्य के अनुसंधानों के लिए प्रेरित करती हैं। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कोशिका संवर्धन तकनीक का अत्यधिक महत्व है और इस कार्यशाला के माध्यम से प्रतिभागियों ने इस तकनीक की जटिलताओं को समझा और उसे व्यावहारिक रूप में लागू करना सीखा।
सभी के प्रति आभार
कार्यशाला के समापन समारोह में डॉ. किशोर शेंडे (सूचना अधिकारी) ने उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्तियों, विशेषज्ञों, प्रतिभागियों और विश्वविद्यालय प्रशासन का धन्यवाद करते हुए कहा इस कार्यशाला के सफल आयोजन के पीछे अनेक लोगों का सहयोग रहा है और यह सभी के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है कि प्रतिभागियों ने इतनी उपयोगी जानकारी प्राप्त की।
उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को भी धन्यवाद दिया, जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। डॉ. शेंडे ने यह भी कहा कि ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन भविष्य में भी किया जाता रहेगा, ताकि छात्रों और शोधकर्ताओं को नवीनतम तकनीकों से अवगत कराया जा सके और उनके व्यावसायिक कौशल को और निखारा जा सके।
कार्यशाला के परिणाम और भविष्य की संभावनाएं
इस कार्यशाला ने प्रतिभागियों को कोशिका संवर्धन की जटिल तकनीकों के बारे में गहन जानकारी प्रदान की, जो उन्हें जैव प्रौद्योगिकी और संबंधित क्षेत्रों में आगे बढ़ने में मदद करेगी। इन तकनीकों का उपयोग न केवल स्वास्थ्य देखभाल और वैक्सीन निर्माण में किया जा सकता है, बल्कि यह अनुसंधान के अन्य क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। प्रतिभागियों ने कार्यशाला के दौरान सीखी गई तकनीकों की सराहना की और कहा कि वे अपने भविष्य के शोध कार्यों में इन तकनीकों का प्रयोग करेंगे।
यह कार्यशाला केवल कोशिका संवर्धन तकनीक पर केंद्रित नहीं थी, बल्कि इसमें प्रतिभागियों को अनुसंधान के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने और विज्ञान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया गया। इस तरह के आयोजन छात्रों और शोधकर्ताओं के बीच विज्ञान और अनुसंधान के प्रति रुचि जागृत करते हैं, जो भविष्य में हमारे समाज के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
नए अवसरों के खुले द्वार
इस चार दिवसीय कार्यशाला ने न केवल स्थानीय बल्कि देशभर के प्रतिभागियों के लिए जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान के क्षेत्र में नए अवसरों के द्वार खोले हैं। इस तरह की पहलें भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और भविष्य में वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में देश को सशक्त बनाने की दिशा में एक ठोस कदम हैं।
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