रविवार की शाम को संग्रहालय में दीप प्रज्वलन और कलाकारों के स्वागत के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की गई। यह सम्मान आचार्य जैराम त्रिवेदी द्वारा किया गया, जिन्होंने कलाकारों का स्वागत करते हुए लोककला की महत्ता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर संग्रहालय के परिसर में कला प्रेमियों और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ने वाले दर्शकों की भारी भीड़ देखी गई, जिसमें स्थानीय लोग, पर्यटक और संस्कृति प्रेमी शामिल थे।
पहली प्रस्तुति पन्ना जिले की शक्ति दुबे और उनके साथियों द्वारा दी गई, जिन्होंने "बुंदेली लोकगीत और भजन" प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और उसमें निहित परंपराओं को इन गीतों के माध्यम से जीवंत कर दिया गया। शक्ति दुबे ने अपने लोकगीतों से बुंदेली जीवन के संघर्षों, खुशियों और धार्मिक भावनाओं को सुरों में पिरोया। उनके साथियों ने संगीत की धुनों के साथ प्रस्तुति को और भी प्रभावी बनाया। बुंदेली लोकगीतों की सहजता और भक्ति भाव से भरे भजनों ने दर्शकों को पुरानी परंपराओं की याद दिलाई और उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम किया।
दूसरी प्रस्तुति में छतरपुर से आंए कमलेश यादव और उनके साथियों ने मंच संभाला। उन्होंने भी बुंदेली लोकगीतों की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति दी, जिसमें बुंदेलखंड की अनूठी लोक धुनों और गीतों की विविधता साफ झलकी। उनकी गायकी और संगीत की सादगी ने दर्शकों के दिलों में विशेष स्थान बना लिया। बुंदेलखंड की प्राकृतिक सुंदरता, जनजीवन और धार्मिक परंपराओं को इन गीतों के माध्यम से बेहद आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया गया, जिससे न केवल बुंदेली संस्कृति प्रेमी, बल्कि अन्य दर्शक भी मंत्रमुग्ध हो गए।
कार्यक्रम की अंतिम और सबसे अद्भुत प्रस्तुति "गुन्नूर साई नृत्य" थी, जिसे सिवनी के संदीप उईके और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह नृत्य गोंड समुदाय का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे खासतौर पर तीज-त्योहारों, शादी-विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है। गुन्नूर साई नृत्य की अनोखी शैली, जिसमें नर्तक रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में होते हैं और नृत्य के दौरान अपने शरीर को लयबद्ध तरीके से हिलाते-डुलाते हैं, ने पूरे आयोजन को और भी रोमांचक बना दिया।
गोंड समुदाय के इस नृत्य में ताल और धुन की एक अद्वितीय लय होती है, जो दर्शकों को अपने साथ बांधे रखती है। यह नृत्य समूह में किया जाता है और इसे प्रस्तुत करते हुए नर्तक अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस नृत्य ने दर्शकों को गोंड समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर से रूबरू कराया और उन्हें मध्य प्रदेश की जनजातीय कला के विविध रंगों का अनुभव कराया।
इस आयोजन के बाद, संग्रहालय में अगले रविवार, 27 अक्टूबर को ‘देशज’ समारोह की अगली कड़ी आयोजित की जाएगी, जिसमें बलराम पुरोहित और उनके साथियों द्वारा बुंदेली लोकगीत एवं भजन प्रस्तुत किया जाएगा। इसके अलावा हर्षवर्धन सिंह परिहार और उनके साथी सतना से बघेली गायन की प्रस्तुति देंगे। दतिया से सीमा पाल और उनके साथियों द्वारा बुंदेली लोकगीत और पन्ना से अक्षय खरे और उनके साथियों द्वारा दीवारी नृत्य की विशेष प्रस्तुति दी जाएगी।
‘देशज’ समारोह के माध्यम से, आदिवर्त संग्रहालय ने न केवल पारंपरिक लोककला और संगीत को जीवंत बनाए रखने का प्रयास किया है, बल्कि नई पीढ़ी को भी इन धरोहरों से अवगत कराने का एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान किया है। कार्यक्रम के दौरान कलाकारों और दर्शकों के बीच हुए संवाद ने कला और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने का काम किया।
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