खजुराहो। मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा स्थापित 'आदिवर्त' जनजातीय लोककला राज्य संग्रहालय, खजुराहो में हर रविवार को होने वाले 'देशज' समारोह में इस बार भी लोककला और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। रविवार शाम 6:30 बजे आयोजित इस समारोह में बुंदेली लोकगीतों, भजनों और पारंपरिक नृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य जनजातीय और लोककलाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उन्हें मंच प्रदान करना है, जिससे विभिन्न पारंपरिक विधाओं को लोग और अधिक समझ सकें और उनके प्रति जुड़ाव महसूस करें।
दीप प्रज्वलन और कलाकारों का स्वागत
'देशज' समारोह की शुरुआत हमेशा की तरह दीप प्रज्वलन और कलाकारों के सम्मान के साथ हुई। इस बार का दीप प्रज्वलन और कलाकारों का स्वागत वरिष्ठ बैगा जनजातीय कलाकार सावनी बाई बैगा द्वारा किया गया, जो शिखर सम्मान से सम्मानित हैं। उनके नेतृत्व में कलाकारों का अभिवादन कर समारोह की शुरुआत की गई। इस पारंपरिक विधि के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक धरोहर को प्रकट किया गया, जिसमें समर्पण और आदर का भाव साफ झलकता है।
कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति दमोह के बलीराम पटेल और उनके साथियों द्वारा दी गई, जिसमें उन्होंने बुंदेली लोकगीत और भजनों का गायन किया। बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में लोकगीतों का विशेष स्थान है। ये गीत बुंदेली जनजीवन, उनके संघर्ष, खुशियों और भावनाओं को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। बलीराम पटेल और उनके साथी कलाकारों की गायकी में वह आत्मीयता और सरलता थी, जिसने सभी श्रोताओं के दिल को छू लिया। बुंदेली भजनों की मधुर धुनों और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
इसके बाद कार्यक्रम में खजुराहो के इंद्रजीत दीक्षित और उनके साथियों द्वारा 'जवारे नृत्य' की प्रस्तुति दी गई। यह बुंदेलखंड का पारंपरिक लोकनृत्य है, जो नवरात्रि के समय में विशेष रूप से किया जाता है। जवारे नृत्य में खेतों में बोई जाने वाली जवारियों को पूजा के रूप में मनाया जाता है, जो धरती माता की उर्वरता और फसल के लिए आभार का प्रतीक होता है। इस नृत्य में नृत्यांगनाओं की पोशाक और उनकी सजावट बुंदेली परंपरा की खूबसूरती को प्रदर्शित करती है। इंद्रजीत दीक्षित और उनकी टीम ने नवरात्रि के इस अनूठे नृत्य की आकर्षक और जीवंत प्रस्तुति दी, जिससे मंच पर बुंदेलखंड की सांस्कृतिक झलक दिखाई दी।
जवारे नृत्य के बाद पन्ना की बेदिका मिश्रा एवं उनके साथियों ने बुंदेली संस्कार गीतों की प्रस्तुति दी। ये संस्कार गीत बुंदेली संस्कृति में जन्म, विवाह और अन्य सामाजिक उत्सवों के दौरान गाए जाते हैं। बेदिका मिश्रा ने भगत, सोहर और कार्तिक गीत की अद्वितीय प्रस्तुति दी, जिसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक उत्सवों और जीवन की गूंज सुनाई दी। इन गीतों में जीवन के हर पहलू का सार समाहित होता है, चाहे वह नई जीवन की शुरुआत हो या फिर प्रकृति के साथ मनुष्य का गहरा संबंध। बेदिका मिश्रा और उनकी टीम की सजीव गायन प्रस्तुति ने दर्शकों को बुंदेली जीवन की सादगी और गहराई से परिचित कराया।
समारोह की अंतिम प्रस्तुति सागर की पूजा श्रीवास्तव और उनके साथियों द्वारा दी गई, जिसमें 'अखाड़ा नृत्य' प्रस्तुत किया गया। यह नृत्य बुंदेलखंड की वीरांगनाओं की शौर्य गाथाओं को प्रदर्शित करता है। इस नृत्य में लोकसंगीत, शस्त्र संचालन और गायन के माध्यम से उन वीर महिलाओं की वीरता को उजागर किया गया, जिन्होंने अपने जीवन में अद्वितीय साहस दिखाया। अखाड़ा नृत्य के माध्यम से बुंदेलखंड की उन वीरांगनाओं की कहानियां जीवंत हो उठीं, जिन्होंने अपने समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। यह नृत्य दर्शकों को बुंदेलखंड की वीरता और शौर्य की भावना से भर गया, साथ ही उनके साहस और अदम्य आत्मबल की प्रेरणा प्रदान की।
'देशज' समारोह की यह कड़ी एक अद्वितीय सांस्कृतिक अनुभव प्रदान करने में सफल रही, जहां बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के विभिन्न पहलुओं की झलकियां प्रस्तुत की गईं। इस आयोजन में बुंदेली संस्कृति के विविध रंग देखने को मिले, चाहे वह लोकगीत हो, नृत्य हो या फिर वीरता की गाथाएं।
अगले रविवार 20 अक्टूबर 2024 को भी 'देशज' के अंतर्गत कई सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इस बार शक्ति दुबे और उनके साथी सिमरिया द्वारा बुंदेली लोकगीत एवं भजन, संदीप उईक और उनके साथी सिवनी द्वारा गुन्नूर साही नृत्य और कमलेश यादव, छतरपुर द्वारा बुंदेली लोकगीतों की प्रस्तुति दी जाएगी। यह कार्यक्रम भी दर्शकों के लिए सांस्कृतिक धरोहर का एक अद्भुत अनुभव होगा।
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