कटनी। संस्कृति विभाग की सिंधी साहित्य अकादमी के सहयोग से आयोजित नाट्य समारोह में गुरुवार को दो अद्वितीय नाटकों के मंचन के साथ दर्शकों का दिल जीत लिया। इस समारोह में समाज की कुरीतियों और मानवीय मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। दोनों नाटक अपने विषय और प्रस्तुति के कारण दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ने में सफल रहे।
पहला नाटक: "इहयो ई सचु आ" (यही सच है)
नाट्य समारोह में पहला नाटक "इहयो ई सचु आ" था, जिसे नाटककार जोधाराम जयसिंघानी ने लिखा और निर्देशित किया। 11 कलाकारों के दल ने इस नाटक को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया, जो समाज में व्याप्त कुरीतियों और गंभीर सामाजिक समस्याओं को उजागर करता है।
नाटक की कहानी में आधुनिक समाज के उन पहलुओं को दर्शाया गया, जो आम लोगों की जिंदगी में समस्याएं पैदा करते हैं। कलाकारों ने अपने अभिनय से न केवल दर्शकों को गुदगुदाया, बल्कि उन्हें सोचने पर भी मजबूर कर दिया। संवादों की तीव्रता और कलाकारों की भावनात्मक अभिव्यक्ति ने दर्शकों को एक अनूठा अनुभव प्रदान किया।
इस नाटक ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि समाज में सुधार लाने के संदेश को भी खूबसूरती से पेश किया। यह नाटक एक प्रतीकात्मक दर्पण के रूप में कार्य करता है, जो समाज के दोषों को दिखाता है और उनसे निपटने के लिए प्रेरणा देता है।
दूसरे नाटक ने एक अलग कहानी के साथ दर्शकों को अपने जाल में बांध लिया। "थोड़ो आहे, थोड़े जी घुरिज आहे" मूल रूप से मराठी में लिखित नाटक है, जिसके लेखक संदीप सरवटे हैं। इसका सिंधी अनुवाद राजकुमारी पंजवानी ने किया है। युवा निर्देशक जय पंजवानी (इंदौर) ने इस नाटक को निर्देशित किया, जिसे सिंधु नाटक परिषद-इंदौर के नौ सदस्यीय कलाकार दल ने प्रस्तुत किया।
नाटक की कहानी एक मध्यम वर्गीय युवक और महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक एक ऐसा बैग पा लेते हैं जिसमें बैंक से लूटा गया रुपया भरा होता है। बैग पाकर उनके मन में लालच और अंतरात्मा के बीच द्वंद्व शुरू हो जाता है।
शुरुआत में, आर्थिक जरूरतें उन पर हावी हो जाती हैं और वे रुपयों को अपने पास रखने का मन बनाते हैं। लेकिन धीरे-धीरे अंतरात्मा की आवाज उन्हें सही और गलत के बीच का फर्क समझाती है। रुपयों के लालच से मन की शांति छिन जाने के बाद, वे बैग को सही तरीके से लौटाने का फैसला करते हैं।
नाटक की प्रस्तुति में कलाकारों ने अपनी अभिनय क्षमता और संवाद अदायगी से दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। कहानी ने यह संदेश दिया कि ईमानदारी और अंतरात्मा की आवाज हमेशा जीवन में सही दिशा दिखाती है।
दोनों नाटकों ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। जहां "इहयो ई सचु आ" ने समाज की कुरीतियों और समस्याओं पर व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, वहीं "थोड़ो आहे, थोड़े जी घुरिज आहे" ने मानवीय मूल्यों और ईमानदारी के महत्व को रेखांकित किया। दर्शकों ने इन नाटकों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी प्रस्तुतियां न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि समाज में सुधार और सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करती हैं।
यह नाट्य समारोह केवल एक मंचन का अवसर नहीं था, बल्कि संस्कृति और मानवीय मूल्यों को संरक्षित और प्रचारित करने का एक मंच था। ऐसे आयोजनों से समाज में जागरूकता फैलाने और युवा पीढ़ी को सही दिशा में प्रेरित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया जाता है।
Subscribe to our newsletter for daily updates and stay informed
© indianewsvista.in. All Rights Reserved.