सामाजिक

सामाजिक एकता और समरसता के प्रतीक हैं सार्वजनिक उत्सव : लेखक राजकुमार बरूआ

लेखक राजकुमार बरूआ की सार्वजनिक उत्सव: हमारी सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता का अनमोल सूत्र पर विशेष टिप्पणी

ऐक्यं बलं समाजस्य तद्भावे सदुर्बलः। 

तस्मात् ऐक्यं प्रशंसन्ति दृष्टं राष्ट्र हितैशिनः ॥

भोपाल। हमारा भारत अपनी सांस्कृतिक धरोहर के लिए पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है हमारी संस्कृति हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है जिस कारण से हम अपने सभी तीज-त्यौहार को हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं,और यही तीज-त्यौहार हमें आनंद के साथ ही सकारात्मक सोच बनाए रखने में मदद करते हैं। हर भारतीय परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के अनुरूप अपने धार्मिक उत्सव को मनाया जाता है जो आने वाली पीढ़ियों को भी अपने रीति-रिवाजो से परिचय करवाती साथ ही उस रीति रिवाज को क्यों और किस वजह से मनाया जाता है उनकी बारीकियां भी सिखाती है पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली इसी परंपरा के कारण ही हमारी सभ्यता आज भी उसी रूप में कायम है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी सनातन धर्म की एक खूबसूरती यह भी है कि वहां समय के अनुरूप खुद को ढाल लेता है या नए शब्दों में कहा जाए तो अपडेट होता रहा है। सार्वजनिक उत्सवों में गणेश उत्सव,दुर्गा उत्सव,होली उत्सव और भी इसी प्रकार के कई उत्सव है जो हमारे समाज को एक दूसरे के साथ घुलने-मिलने का मौका देते हैं और उनमें आपसी भाईचारा और प्रेम बनाकर रखते हैं हर त्यौहार को हम लोग एक नए उत्साह के साथ मना कर अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाते हैं जो हमें हर परिस्थिति से लड़ने की शक्ति देता है और हमारा मनोबल बनाए रखता है। सार्वजनिक उत्सव के अनेक महत्व हैं यही उत्सव हमारी सामाजिक एकता को बनाए रखने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं सामाजिक समरसता के लिए भी इन उत्सवों का अपना एक विशेष योगदान है इन उत्सवों में ही हम जाति ऊंच-नीच अमीरी गरीबी छोटा बड़ा हर बात को पीछे छोड़कर सब एक दूसरे के साथ घुल-मिल कर उत्सव को मनाकर सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी को जोड़े रखते हैं।


समरसता के लिए भी सार्वजनिक उत्सव अपना विशेष महत्व रखता है किसी भी उत्सव के लिए लोगों का एक दूसरे के साथ घुल-मिल कर रहना आवश्यक है, भंडारे के रूप में एक साथ बैठकर भोजन करना इन सारी बातों से ही समरसता फलती और फूलती है जो हमारे समाज और देश के लिए जरूरी है और सभी में आपसी प्रेम की भावना को जागृत रखती, आज के बदलते आधुनिक युग में सार्वजनिक उत्सवों का महत्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आज भागती-दौड़ती जिंदगी में हम कई ऐसी महत्वपूर्ण भावनाओं से दूर होते जा रहे हैं जो परिवार और समाज के लिए बहुत जरूरी है, वर्तमान समय में एकल परिवार की संख्या बढ़ती जा रही है जिस वजह से कुछ परिवारों में अपनी संस्कृति के प्रति लापरवाही भी बढ़ती जा रही है जिस कारण से आने वाली पीढ़ियों को अपने संस्कारों की जानकारियों का अभाव होता है और इन अभाव का ही कुछ अधर्मी फायदा उठाकर उन्हें गलत रास्ते पर ले जा रहे हैं, उनकी इन कोशिशों को नाकाम करने में भी सार्वजनिक उत्सवों की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है हर क्षेत्र में अपने समर्थ अनुसार सार्वजनिक उत्सव की व्यवस्था की जाती है जिसमें उसे क्षेत्र के लगभग सारे लोग सम्मिलित होकर उस उत्सव का आनंद तो लेते ही हैं साथ ही अपनी परंपराओं से भी जुड़े रहते हैं और सभी का एक दूसरे से संपर्क बने रहता है जो उन्हें सुख दुख में साथ देने के लिए भी प्रेरित करता हैं। सार्वजनिक उत्सवों के अनेकों फायदे हैं वर्तमान में युवा पीढ़ी में सार्वजनिक उत्सवों के द्वारा ही संगठित होकर काम करने की भावना को जगाने में भी सार्वजनिक उत्सव अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। 

संगठित होना : युवाओं द्वारा छोटी-छोटी टोली बनाकर सार्वजनिक उत्सव के लिए घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा कर उस धन संग्रह करते हैं, जिससे सभी लोगों में हमारा भी योगदान है यह भावना बनी रहती है। 

प्रबंधन :  यूवा टोली सामूहिक रूप से आयोजन के प्रबंध के लिए योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करने की रूपरेखा बनाते हैं जो उनमें कार्य को योजनावत तरीके से करने की कुशलता का विकास करती है। 

संस्कृति से जुड़ाव : सार्वजनिक उत्सव के द्वारा ही हम अपने रीति-रिवाजों और संस्कृति को दोहराते रहते हैं जिनसे आने वाली पीढ़ियों का निरंतर अभ्यास होता रहता है और उनके प्रति उनका विश्वास बढ़ता है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम : छोटी-छोटी झांकियों पर नन्हे मुन्ने बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया जाता हैं  जिससे उनकी प्रतिभा का निखार होता है और आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी होती है,

भंडारा : ऐसे अनेक अवसर आते हैं जिसमे भंडारे का आयोजन किया जाता है साथ में भोजन करने से लोगों में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव बढ़ता है और गरीब अमीर जात-पात ऊंच-नीच की भावनाओं को दर किनार कर समरसता की भावना जागृत रहती है। 

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेश उत्सव की शुरुआत की थी तिलक जी का मकसद सभी लोगों को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता को बढ़ाना था, धार्मिक आयोजन के द्वारा राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करना था। भारत वर्तमान समय में कुछ राजनीतिक लोगों ने इन आयोजन का राजनीतिक लाभ के लिए ज्यादा उपयोग किया जाता है और कई जगह तो अपनी वर्चस्व की लड़ाई के रूप में भी इसे प्रसारित किया जाता है जो इन आयोजन की मूल भावना को भारी नुकसान पहुंचा कर एक दूसरे के प्रति बैर रखना की भावना ज्यादा बनती जा रही है इन लोगों से सावधान रहकर हमें अपनी मूल भावनाओं पर रहकर सार्वजनिक उत्सव को इस भावना के साथ मनाना चाहिए जिस उद्देश्य के लिए इन उत्सवों का उदय हुआ था, कई जगह देखा गया है कि सार्वजनिक उत्सव अपने महत्व को भूल कर भव्यता पर ज्यादा ध्यान देते हैं और इन उत्सवों का व्यापारिक दृष्टिकोण से ज्यादा लाभ कमाना ही उनका मकसद बन गया है। पर हमें सावधानी के साथ सार्वजनिक उत्सव की मूल भावनाओं को बनाए रखना है जो हमारी अखंडता के लिए अति आवश्यक है राष्ट्रीय प्रेम सामाजिक एकता समरसता इन उत्सवों की मूल भावना रही है। भारत को एक सूत्र में बांधने का काम भी इन सार्वजनिक उत्सव के द्वारा ही किया जा सकता है जो हमें राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करके राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की भी प्रेरणा देते हैं।

India News Vista
165

Newsletter

Subscribe to our newsletter for daily updates and stay informed

Feel free to opt out anytime
Get In Touch

+91 99816 65113

[email protected]

Follow Us

© indianewsvista.in. All Rights Reserved.