भोपाल। मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आयोजित 'पुतुल समारोह' ने कठपुतली कला की विविध शैलियों को एक मंच पर लाकर कला प्रेमियों के लिए एक अनूठा अनुभव प्रस्तुत किया। 13 से 16 अक्टूबर तक आयोजित इस समारोह में, धागा और छाया पुतली शैलियों का अद्भुत संगम दर्शकों को देखने को मिल रहा है। 14 अक्टूबर को हुई प्रस्तुति में महाराष्ट्र से आए प्रतिष्ठित कलाकार पद्मश्री परशुराम गंगावने और उनके बेटे चेतन गंगावने ने अपने साथियों के साथ मिलकर रामायण के कुछ प्रमुख प्रसंगों का मार्मिक और रोमांचक चित्रण किया।
श्रीगणेश वंदना से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत कलाकारों के भव्य स्वागत से हुई, जिसके बाद मंच पर श्रीगणेश वंदना प्रस्तुत की गई। धागा पुतली शैली में की गई इस वंदना में गणेशजी और उनके वाहन मूषक की पूजा-आराधना को प्रदर्शित किया गया। धागा पुतली की बारीक कारीगरी और कलाकारों के उत्कृष्ट संचालन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। गणेशजी के व्यक्तित्व और पूजा के भावपूर्ण चित्रण ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
सीता स्वयंवर प्रसंग, शिव धनुष का टूटना
इसके बाद रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंग 'सीता स्वयंवर' को धागा-छाया पुतली के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इस दृश्य में दिखाया गया कि महाराज जनक अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर की घोषणा करते हैं। स्वयंवर की शर्त थी कि जो भी राजा शिव धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता से विवाह करेगा। रावण सहित कई राजाओं ने इस प्रयास में असफल होने के बाद, भगवान श्रीराम ने शिव धनुष को तोड़कर स्वयंवर की शर्त पूरी की और माता सीता से उनका विवाह संपन्न हुआ।
इस प्रसंग में धागा पुतली का प्रयोग बेहद कौशलपूर्वक किया गया। कलाकारों ने पुतली के संचालन में इतनी निपुणता दिखाई कि दर्शक सजीव चित्रण के भाव में खो गए। सीता और राम के विवाह की इस कथा ने पौराणिक साहित्य और लोककला का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसे देखकर दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सभागार गूंज उठा।
शूर्पणखा, खर-दूषण और सोने का हिरण
इसके बाद रामायण के वनवास काल का 'पंचवटी प्रसंग' दिखाया गया, जिसमें श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी में निवास कर रहे थे। इसी दौरान, राक्षसी शूर्पणखा ने श्रीराम से विवाह करने की इच्छा जताई, लेकिन जब उसे मना किया गया, तो वह क्रोधित हो गई और लक्ष्मण द्वारा उसकी नाक काट दी गई। इस अपमान का बदला लेने के लिए राक्षस खर-दूषण आए, जिन्हें श्रीराम और लक्ष्मण ने युद्ध में पराजित किया।
धागा और छाया पुतली के प्रयोग ने इस प्रसंग को और भी जीवंत बना दिया। विशेष रूप से, सोने का हिरण बनकर मारीच का प्रकट होना और सीता के उसके प्रति आकर्षण ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ा। मारीच की मृत्यु और श्रीराम की आवाज सुनने पर लक्ष्मण का सीता के पास से जाना और फिर रावण द्वारा सीता का हरण, इन सभी दृश्यों को इतनी कुशलता से प्रस्तुत किया गया कि दर्शक एक पल के लिए भी अपनी नजरें मंच से हटा नहीं पाए।
धागा-छाया पुतली कला की अनूठी प्रस्तुति
इस पूरे प्रदर्शन में 40 से अधिक धागा और छाया पुतलियों का प्रयोग किया गया। पद्मश्री परशुराम गंगावने और उनके बेटे चेतन गंगावने की अगुवाई में इस कला का प्रदर्शन एक कला प्रेमियों के लिए एक बेजोड़ अनुभव था। मंच पर पुतलियों की जीवंतता और दृश्यों की सजीवता ने दर्शकों को प्राचीन लोककला की महत्ता से अवगत कराया। धागा पुतली की बारीकियों और छाया पुतली की कलात्मकता ने प्रस्तुति को और भी प्रभावी बनाया।
चेतन गंगावने ने इस अवसर पर बताया कि वे 16 वर्ष की आयु से कठपुतली कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिता से इस कला को सीखा और देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी प्रस्तुति दी है। उन्होंने कहा कठपुतली कला हमारे पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है और इसे संरक्षित करने के लिए हमें इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना होगा।
कला का संरक्षण और संवर्धन
जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आयोजित इस 'पुतुल समारोह' का मुख्य उद्देश्य कठपुतली कला की प्राचीन शैलियों को संरक्षित करना और उन्हें आधुनिक समय में प्रासंगिक बनाए रखना था। इस प्रकार के आयोजन कलाकारों को अपने हुनर को प्रदर्शित करने का अवसर देते हैं और नई पीढ़ी को इस कला से परिचित कराते हैं। समारोह के आयोजकों ने बताया कि इस तरह के कार्यक्रमों से युवा पीढ़ी में लोककलाओं के प्रति जागरूकता और रुचि बढ़ती है, जो सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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