भोपाल। संस्कृति भवन में आयोजित "लेखक से भेंट" कार्यक्रम में सिंधी भाषा के वरिष्ठ लेखक और अनुवादक खीमन यू मूलानी ने अनुवाद की जटिलताओं और अपनी साहित्यिक यात्रा की प्रेरणादायक कहानी साझा की। यह कार्यक्रम साहित्य अकादमी, भारत सरकार और मध्य प्रदेश सिंधी साहित्य अकादमी के सहयोग से आयोजित किया गया था। खीमन मूलानी ने लगभग पौन घंटे के आत्मकथ्य में अपनी लेखन यात्रा, अनुवाद के अनुभव और उसके दौरान आई कठिनाइयों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भले ही मूल लेखन कठिन हो, लेकिन अनुवाद उससे भी जटिल कार्य है, क्योंकि इसमें सांस्कृतिक, भाषाई और भावनात्मक अर्थों को बनाए रखना एक चुनौती होती है।
खीमन मूलानी का मानना है कि अनुवाद करते समय कई बार ऐसे क्षेत्रीय और सांस्कृतिक शब्द सामने आते हैं जिनके लिए लक्ष्य भाषा में उचित विकल्प नहीं होते। उनका कहना था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां हर क्षेत्र की अपनी संस्कृति, खानपान, वेशभूषा और लोकाचार होता है, वहां भाषा के मौलिक अर्थ को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से अनुवाद को सहज भावानुवाद बनाना कठिन हो जाता है और कई बार यह शब्दानुवाद बनकर रह जाता है।
श्री मूलानी ने अपने बचपन के किस्सों को साझा करते हुए बताया कि उन्होंने भोपाल में ही अपने शुरुआती वर्ष बिताए। लगभग 43 पुस्तकों के रचयिता मूलानी जी का साहित्य सृजन में पूरा जीवन समर्पित रहा है। इनमें से 34 पुस्तकें हिंदी और सिंधी भाषा के अनुवाद कार्य पर आधारित हैं। कविता, शायरी, उपन्यास, कहानी, यात्रा संस्मरण और साक्षात्कार आदि विधाओं में रचनाओं का अनुवाद करने वाले मूलानी जी ने बताया कि उन्हें बचपन से पत्र-पत्रिकाओं और साहित्य में रुचि थी। बाद में उन्हें सिंधी साहित्य उपलब्ध हुआ, जिसने उन्हें और अधिक गहराई से अध्ययन करने की प्रेरणा दी। धीरे-धीरे उनके मन में अनुवाद कार्य करने की इच्छा जागृत हुई, जिसके बाद उन्होंने हिंदी से सिंधी और सिंधी से हिंदी में अनुवाद का कार्य शुरू किया। आज तक लगभग 500 रचनाओं का अनुवाद संपन्न कर चुके मूलानी जी का साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा मूल लेखन और अनुवाद दोनों में योगदान के लिए सम्मानित किया जा चुका है।
इस कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया था, जिसमें भोपाल के साहित्य प्रेमियों, पाठकों और अन्य रचनाकारों ने उत्सुकता से हिस्सा लिया। इस सत्र में उन्होंने श्री मूलानी से उनके साहित्यिक सृजन के अनुभवों और अनुवाद के दौरान आई चुनौतियों के बारे में सवाल पूछे। मूलानी जी ने अपने अनुवाद कार्य के दौरान की गई कठिनाइयों, सांस्कृतिक संदर्भों को संभालने की जटिलता और भाषाओं के बीच की भावनात्मक अंतर को संतुलित करने के प्रयासों को साझा किया। इस आत्मकथ्य से उपस्थित श्रोता काफी प्रभावित हुए और उनके जवाबों से कई जिज्ञासाओं का समाधान पाया।
इस अवसर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मोहन गेहाणी भी उपस्थित थे, जिन्होंने इस कार्यक्रम को और भी विशेष बना दिया। कार्यक्रम के दौरान, मध्य प्रदेश सिंधी साहित्य अकादमी के निदेशक राजेश कुमार वाधवानी ने कहा कि अकादमी साहित्यिक आयोजनों के लिए अपने कार्यालय को सक्रिय रूप से उपयोग में लाने की दिशा में कार्यरत है। उन्होंने इस कार्यक्रम को एक नई शुरुआत मानते हुए साहित्य अकादमी द्वारा भारतीय भाषाओं और लेखकों को सशक्त करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया। प्रारंभ में, अशोक मनवाणी, सदस्य सिंधी सलाहकार बोर्ड, ने भी साहित्य अकादमी के उद्देश्यों और योजनाओं के बारे में बताया।
कार्यक्रम के अंत में खीमन मूलानी ने अपनी स्वरचित रचनाओं और प्रसिद्ध संत कंवर राम के भक्ति गीत "नाले अलख जे बेड़ो तार मुहिंजो" का सस्वर पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस भक्ति गीत की प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया और यह कार्यक्रम का एक यादगार पल बन गया। उनके काव्य और भक्ति भाव से ओत-प्रोत प्रस्तुति ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।
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