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जनजातीय संग्रहालय में सौंगी मुखौटा नृत्य से हुई प्रतिरूप समारोह की शुरुआत

तीन दिवसीय कार्यक्रम में 10 राज्यों और 8 देशों के मुखौटों का होगा अनूठा प्रदर्शन

भोपाल। मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में शुक्रवार को जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा आयोजित तीन दिवसीय "मुखौटा आधारित लोक कला प्रतिरूप समारोह" का शुभारंभ किया गया। जिसमें मुखौटों के उपयोग पर आधारित अनूठी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस समारोह में 10 राज्यों और 8 देशों की लोककलाओं में मुखौटों के प्रयोग पर आधारित नृत्य और कलात्मक प्रस्तुतियां दी जा रही हैं। यह समारोह 29 सितंबर तक चलेगा। 

समारोह का उद्घाटन 27 सितंबर को हुआ, जिसमें पद्मश्री से सम्मानित दुर्गा बाई व्याम, अर्जुन सिंह धुर्वे, संस्कृति संचालनालय के संचालक एनपी नामदेव और जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और कलाकारों के स्वागत से हुई, जो एक सांस्कृतिक यात्रा का आरंभ था।

अंतर्राष्ट्रीय मुखौटा प्रदर्शनी

इस आयोजन की एक खास विशेषता यह थी कि संग्रहालय में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मुखौटा प्रदर्शनी का संयोजन किया गया। यह प्रदर्शनी हिमालय विश्व संग्रहालय, सिक्किम के सहयोग से आयोजित की गई, जिसमें भारत के सात राज्यों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, तिब्बत, बांग्लादेश, मलेशिया, फिजी, श्रीलंका और इंडोनेशिया सहित 8 देशों से मुखौटों को प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में लगभग 100 विभिन्न प्रकार के मुखौटे शामिल किए गए, जो इन देशों की पारंपरिक संस्कृति और कलात्मक धरोहर को प्रदर्शित करते हैं। मुखौटों की यह अनूठी प्रदर्शनी केवल कला प्रेमियों के लिए नहीं, बल्कि सभी लोगों के लिए एक दुर्लभ अवसर था, जिसमें उन्हें विभिन्न संस्कृतियों की गहराई से जुड़ी प्रथाओं और मान्यताओं का अनुभव करने का अवसर मिला।


मुखौटों का अनूठा प्रदर्शन

तीन दिवसीय इस समारोह में विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने अपने पारंपरिक नृत्यों के माध्यम से मुखौटों की महत्ता और उनकी सांस्कृतिक प्रासंगिकता को दर्शाया। पहले दिन की शुरुआत महाराष्ट्र के छबिलदास विष्णु गवली और उनके साथियों द्वारा सौंगी मुखौटा नृत्य से हुई। यह नृत्य चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर देवी पूजन के साथ किया जाता है। नृत्य में नरसिंह, काल भैरव और बेताल के मुखौटे पहनकर कलाकार देवी की महिमा का वर्णन करते हैं। इस नृत्य के वाद्ययंत्रों में ढोल, पंवारी और संबल का प्रयोग होता है और कलाकार हरे रंग के वस्त्रों में सज-धजकर नृत्य करते हैं।


इसके बाद केरल से निशानथ के एम और उनके साथियों ने थैय्यम नृत्य की प्रस्तुति दी। यह नृत्य केरल का पारंपरिक भक्ति नृत्य है, जो हर वर्ष फसल कटाई के बाद भगवान को धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए किया जाता है। थैय्यम नृत्य में कलाकार विशेष मुखौटे पहनकर देवी-देवताओं के रूप धारण करते हैं और अपने नृत्य से भगवान को प्रसन्न करते हैं।


गुजरात के पवनभाई रामूभाई बागुल और उनके साथियों ने भवाड़ा नृत्य की प्रस्तुति दी। भवाड़ा नृत्य में कलाकार विभिन्न देवताओं और असुरों के मुखौटे पहनते हैं और यह नृत्य किसी व्यक्ति या समुदाय की समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है। इस नृत्य में मुखौटों के माध्यम से ग्रामीण लोग अपनी आस्था और धार्मिक मान्यताओं को प्रकट करते हैं।


उड़ीसा के गौरांग नायक और उनके साथियों द्वारा साही जाता नृत्य प्रस्तुत किया गया। यह नृत्य पूर्वी भारत के लोकनाट्य शैली का एक प्रमुख हिस्सा है, जिसमें नरसिंह और गणेश जैसे देवताओं के मुखौटे पहनकर नृत्य किया जाता है।


हिमाचल प्रदेश से आए जोगिंदर सिंह और उनके साथियों ने सिंहटू नृत्य प्रस्तुत किया। इस नृत्य में शेर के मुखौटे पहनकर कलाकार देवी दुर्गा के वाहन का अभिनय करते हैं। यह नृत्य हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जनपद की हाटी जनजाति की पुरानी परंपरा से जुड़ा है। सिंहटू नृत्य पर्यावरण और वन्य जीवन संरक्षण का संदेश भी देता है।

अनूठे नृत्यों का संगम

समारोह में सिक्किम के छबी लाल प्रधान और उनके साथियों ने लाखे नृत्य की प्रस्तुति दी, जो उत्तर भारत के सबसे लोकप्रिय नृत्यों में से एक है। इस नृत्य में कलाकार कागज की लुगदी से बने मुखौटे पहनते हैं और याक की पूंछ से बने बालों का प्रयोग करते हैं।


इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश के चाउ सरथाम नामचूम और उनके साथियों ने खामटी जनजातीय मयूर नृत्य प्रस्तुत किया। यह नृत्य हिमालय क्षेत्र की लोक कथाओं पर आधारित है और इसमें आधे मानव और आधे मोर के मुखौटे पहनकर नृत्य किया जाता है। नृत्य भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से प्रेरित है और प्रेम तथा पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।

सांस्कृतिक अनुभव का आनंद

प्रस्तुतियों के साथ-साथ, समारोह में सुस्वादु व्यंजनों की भी व्यवस्था की गई थी, जिससे दर्शक विभिन्न राज्यों के पारंपरिक भोजन का आनंद ले सके। यह आयोजन न केवल कला और संस्कृति का संगम था, बल्कि यह लोकजीवन की विविधता और उसकी समृद्ध धरोहर को भी प्रस्तुत करता है। मुखौटों के इस अनूठे समारोह ने विभिन्न संस्कृतियों को एक मंच पर लाकर लोगों को उनकी परंपराओं से जोड़ने का काम किया। आयोजन में प्रदर्शित नृत्य और मुखौटे दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक अपनी छाप छोड़ते रहेंगे। 

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