भोपाल। मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमएएनआईटी) के वास्तुकला और योजना विभाग में 25 से 27 अक्टूबर तक तीन दिवसीय हितधारक परामर्श कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की आजीविका को सशक्त बनाना और पारंपरिक आजीविका अवसरों को प्रोत्साहित करना था। कार्यशाला का विषय "इको-टूरिज्म और पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से आजीविका सुरक्षा बढ़ाना" था। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), भारत सरकार और मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड (MPTB) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का समन्वयन एमएएनआईटी के प्रोफेसर अलका भारत, प्रोफेसर योगेश गर्ग और प्रोफेसर सुरभि मेहरोत्रा द्वारा किया गया।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि एमपी इको-टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड की सीईओ, डॉ. समीता राजोरा ने अपने उद्घाटन भाषण में पारंपरिक ज्ञान को इको-टूरिज्म में शामिल करने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि इको-टूरिज्म से जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थितियों को मजबूती मिलेगी और पर्यावरण के साथ-साथ पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर को भी संरक्षित किया जा सकेगा।
मणिपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. लाल बिहारी सिंघा ने कार्यशाला में पारंपरिक ज्ञान प्रणाली पर व्याख्यान देते हुए बांस शिल्पकला के उपयोग से पर्यावरण-अनुकूल होमस्टे की संभावनाओं पर विचार किया। इसके अलावा, आईआईएफएम की डॉ. जिज्ञासा बिसारिया ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और आजीविका विकल्पों पर इसके दुष्प्रभावों पर चर्चा की। पैनल चर्चा में एमपीटीबी की शोध सहयोगी सुप्रिया पाठक ने जानकारी दी कि मध्य प्रदेश सरकार जनजातीय क्षेत्रों की स्थलाकृति के अनुसार नीतिगत हस्तक्षेप तैयार कर रही है ताकि स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकास सुनिश्चित हो सके।
दूसरे दिन एमपीटीबी की डॉ. रंजना मिश्रा ने आदिवासी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए एमपीटीबी की पहल पर विस्तार से चर्चा की। इसके बाद तकनीकी विशेषज्ञों ने मानव संग्रहालय और जनजातीय संग्रहालय का दौरा किया, जहां उन्होंने मध्य प्रदेश के जनजातीय समुदायों द्वारा अपनाई गई पारंपरिक तकनीकों और उनकी विपणन क्षमता का अध्ययन किया। साथ ही, भोपाल के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बांस कारीगर धर्मेंद्र रोहर द्वारा पारंपरिक बांस शिल्पकला और लोकसूत्र द्वारा प्रदर्शित गोंड कला की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई।
कार्यशाला के अंतिम दिन, पैनल में स्थानीय कारीगरों की समस्याओं पर चर्चा हुई। इसमें मुख्य रूप से कच्चे माल के भंडारण, बुनियादी ढांचे की कमी, स्केलेबिलिटी और कमजोर बाजार कनेक्शन जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया, जिससे कारीगरों के सीमांत लाभ में कमी आ रही थी। एमपीटीबी के विशेषज्ञ जुबिन सालू ने होमस्टे के माध्यम से जनजातीय परिवारों की आजीविका को बढ़ाने में कम्युनिटी-आधारित पर्यटन की भूमिका पर जोर दिया।
इस कार्यशाला ने जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए पारंपरिक ज्ञान और संसाधनों को इको-टूरिज्म के माध्यम से एकीकृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रदर्शनी में वन धन केंद्र मंडला के डॉ. खोखर के हर्बल उत्पाद, धर्मेंद्र रोहर की बांस कला और गोंड कला को प्रदर्शित किया गया, जो जनजातीय समाज की सांस्कृतिक धरोहर को सामने लाता है।
कार्यशाला ने निष्कर्ष दिया कि पारंपरिक शिल्प और कृषि को प्रोत्साहित करते हुए इको-टूरिज्म के जरिए जनजातीय समुदायों की आर्थिक सुदृढ़ता में सुधार किया जा सकता है। पारंपरिक ज्ञान को आजीविका सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए ऐसे कार्यक्रम अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
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