भोपाल। मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) में 21 नवंबर को बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण पर एक अर्धदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम (एनआरडीसी), नई दिल्ली के सहयोग से संपन्न हुई। इस आयोजन का उद्देश्य संस्थान के फैकल्टी सदस्यों और शोधार्थियों के बीच पेटेंट दाखिल करने और बौद्धिक संपदा अधिकारों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना था।
कार्यशाला का उद्देश्य और आयोजन का महत्व
कार्यशाला का नेतृत्व मैनिट के प्रभारी निदेशक प्रो. शैलेन्द्र जैन और डीन (आईडी और आईआर) डॉ. एसपीएस राजपूत के मार्गदर्शन में किया गया। बौद्धिक संपदा अधिकार के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने और शोध एवं नवाचार को पेटेंट में बदलने की प्रक्रिया को समझाने के लिए यह कार्यशाला आयोजित की गई। तकनीकी संस्थानों में नवाचार और शोध गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों का महत्व अत्यधिक है।
कार्यशाला के विशेषज्ञ वक्ता डॉ. संजीव कुमार मजूमदार, वरिष्ठ प्रबंधक, एनआरडीसी, नई दिल्ली थे। उन्होंने पेटेंट और कॉपीराइट के महत्व को रेखांकित किया और पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया पर एक विस्तृत सत्र प्रस्तुत किया। डॉ. मजूमदार ने बौद्धिक संपदा के कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डाला और प्रतिभागियों को यह समझाया कि नवाचार को कैसे संरक्षित और व्यावसायीकृत किया जा सकता है।
उन्होंने पेटेंटिंग प्रक्रिया के चरणों को विस्तार से समझाया, जिसमें पेटेंट के लिए आवेदन करने, इसके परीक्षण और व्यावसायीकरण की प्रक्रिया शामिल है। इस सत्र में पेटेंट से जुड़ी चुनौतियों, शोधकर्ताओं की भूमिका और उनके लिए उपलब्ध सहायता प्रणाली पर भी चर्चा की गई।
कार्यशाला में मैनिट के विभिन्न डीन और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. निलय खरे (डीन, आर एंड डी), डॉ. सुंदरलाल पाल (एसोसिएट डीन, आर एंड डी), डॉ. राजेश वाधवानी (एसोसिएट डीन, आर एंड डी), डॉ. जयत्रिलोक चौधरी (एसोसिएट डीन, आईडी और आईआर) और डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह (प्रभारी, वेबसाइट) शामिल थे। इन वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्यशाला के उद्देश्यों की सराहना की और नवाचार एवं शोध को बढ़ावा देने में इसकी प्रासंगिकता पर बल दिया।
कार्यशाला में लगभग 100 फैकल्टी सदस्य और शोधार्थी शामिल हुए। सभी प्रतिभागियों ने विशेषज्ञ सत्रों में गहरी रुचि ली और अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए प्रश्न पूछे। प्रतिभागियों ने पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया और बौद्धिक संपदा के कानूनी प्रावधानों को समझने के लिए विशेषज्ञ से मार्गदर्शन प्राप्त किया।
कार्यशाला के प्रभाव
कार्यशाला ने प्रतिभागियों को बौद्धिक संपदा अधिकारों के महत्व और उनके व्यावसायीकरण की प्रक्रिया को समझने में मदद की। यह आयोजन न केवल तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, बल्कि शोधकर्ताओं को उनके कार्य को पेटेंट के रूप में संरक्षित करने के लिए प्रेरित भी किया।
कार्यक्रम के अंत में प्रभारी निदेशक प्रो. शैलेन्द्र जैन ने प्रतिभागियों और एनआरडीसी के विशेषज्ञों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं संस्थान में नवाचार और शोध के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में सहायक होती हैं।
इस आयोजन ने मैनिट को बौद्धिक संपदा अधिकारों और प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए शोधकर्ताओं को नए आयाम देने का अवसर प्रदान किया।
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